श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.10.40

नवम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

पादुके न्यस्य पुरतः प्रांजलिर्बाष्पलोचनः।

तमाश्‍लिष्य चिरं दोर्भ्यां स्नापयन् नेत्रजैर्जलैः॥ ४०

pāduke nyasya purataḥ prāṃjalirbāṣpalocanaḥ|

tamāśliṣya ciraṃ dorbhyāṃ snāpayan netrajairjalaiḥ|| 40

अर्थ

उन्होंने प्रभुके सामने उनकी पादुकाएँ रख दीं और हाथ जोड़कर खड़े हो गये। नेत्रोंसे आँसूकी धारा बहती जा रही थी। भगवान्‌ने अपने दोनों हाथोंसे पकड़कर बहुत देरतक भरतजीको हृदयसे लगाये रखा। भगवान्‌के नेत्रजलसे भरतजीका स्नान हो गया॥ ४०॥

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