श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.10.56

नवम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

प्रेम्णानुवृत्त्या शीलेन प्रश्रयावनता सती।

धिया ह्रिया च भावज्ञा भर्तुः सीताहरन्मनः॥ ५६

premṇānuvṛttyā śīlena praśrayāvanatā satī|

dhiyā hriyā ca bhāvajñā bhartuḥ sītāharanmanaḥ|| 56

अर्थ

सतीशिरोमणि सीताजी अपने पतिके हृ‌दयका भाव जानती रहतीं। वे प्रेमसे, सेवासे, शीलसे, अत्यन्त विनयसे तथा अपनी बुद्धि और लज्जा आदि गुणोंसे अपने पति भगवान् श्रीरामजीका चित्त चुराती रहती थीं॥ ५६॥✎ 1640

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे
रामचरिते २ दशमोऽध्यायः॥ १०॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    रामानुचरितं नाम।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 60)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1640 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: सती-शिरोमणि → सतीशिरोमणि

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