श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.11.30

नवम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

ततः प्रजा वीक्ष्य पतिं चिरागतं

दिदृक्षयोत्सृष्टगृहाः स्त्रियो नराः।

आरुह्य हर्म्याण्यरविन्दलोचन-

मतृप्तनेत्राः कुसुमैरवाकिरन्॥ ३०

tataḥ prajā vīkṣya patiṃ cirāgataṃ

didṛkṣayotsṛṣṭagṛhāḥ striyo narāḥ|

āruhya harmyāṇyaravindalocana-

matṛptanetrāḥ kusumairavākiran|| 30

अर्थ

परीक्षित्! उस समय जब प्रजाको मालूम होता कि बहुत दिनोंके बाद भगवान् श्रीरामजी इधर पधारे हैं, तब सभी स्त्री-पुरुष उनके दर्शनकी लालसासे घर-द्वार छोड़कर दौड़ पड़ते। वे ऊँची-ऊँची अटारियोंपर चढ़ जाते और अतृप्त नेत्रोंसे कमलनयन भगवान्‌को देखते हुए उनपर पुष्पोंकी वर्षा करते॥ ३०॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें