श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.12.4

नवम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

शिष्यः कौसल्य आध्यात्मं याज्ञवल्क्योऽध्यगाद् यतः।

योगं महोदयमृषिर्हृदयग्रन्थिभेदकम्२॥ ४

śiṣyaḥ kausalya ādhyātmaṃ yājñavalkyo'dhyagād yataḥ|

yogaṃ mahodayamṛṣirhṛdayagranthibhedakam|| 4

अर्थ

कोसलदेशवासी याज्ञवल्क्य ऋषिने उसकी शिष्यता स्वीकार करके उससे अध्यात्मयोगकी शिक्षा ग्रहण की थी। वह योग हृदयकी गाँठ काट देनेवाला तथा परम सिद्धि देनेवाला है॥ ४॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    दनम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 65)

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