कोसलदेशवासी याज्ञवल्क्य ऋषिने उसकी शिष्यता स्वीकार करके उससे अध्यात्मयोगकी शिक्षा ग्रहण की थी। वह योग हृदयकी गाँठ काट देनेवाला तथा परम सिद्धि देनेवाला है॥ ४॥
शिष्यः कौसल्य आध्यात्मं याज्ञवल्क्योऽध्यगाद् यतः।
योगं महोदयमृषिर्हृदयग्रन्थिभेदकम्॥ ४
कोसलदेशवासी याज्ञवल्क्य ऋषिने उसकी शिष्यता स्वीकार करके उससे अध्यात्मयोगकी शिक्षा ग्रहण की थी। वह योग हृदयकी गाँठ काट देनेवाला तथा परम सिद्धि देनेवाला है॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.12.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 65) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/12/4/