इसी ह्रस्वरोमाके पुत्र महाराज सीरध्वज थे। वे जब यज्ञके लिये धरती जोत रहे थे, तब उनके सीर (हल) के अग्रभाग (फाल)-से सीताजीकी उत्पत्ति हुई। इसीसे उनका नाम ‘सीरध्वज’ पड़ा॥ १८॥✎ 1641
ततः सीरध्वजो जज्ञे यज्ञार्थं कर्षतो महीम्।
सीता सीराग्रतो जाता तस्मात् सीरध्वजः स्मृतः॥ १८
इसी ह्रस्वरोमाके पुत्र महाराज सीरध्वज थे। वे जब यज्ञके लिये धरती जोत रहे थे, तब उनके सीर (हल) के अग्रभाग (फाल)-से सीताजीकी उत्पत्ति हुई। इसीसे उनका नाम ‘सीरध्वज’ पड़ा॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.13.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 68) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/13/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)