श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.13.18

नवम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

ततः सीरध्वजो जज्ञे यज्ञार्थं कर्षतो महीम्।

सीता सीराग्रतो जाता तस्मात् सीरध्वजः स्मृतः॥ १८

tataḥ sīradhvajo jajñe yajñārthaṃ karṣato mahīm|

sītā sīrāgrato jātā tasmāt sīradhvajaḥ smṛtaḥ|| 18

अर्थ

इसी ह्रस्वरोमाके पुत्र महाराज सीरध्वज थे। वे जब यज्ञके लिये धरती जोत रहे थे, तब उनके सीर (हल) के अग्रभाग (फाल)-से सीताजीकी उत्पत्ति हुई। इसीसे उनका नाम ‘सीरध्वज’ पड़ा॥ १८॥✎ 1641

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1641 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: केशि-ध्वज → केशिध्वज

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