श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.15.17

नवम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

श्रीशुक १ उवाच

हैहयानामधिपतिरर्जुनः क्षत्रियर्षभः।

दत्तं नारायणस्यांशमाराध्य परिकर्मभिः॥ १७

haihayānāmadhipatirarjunaḥ kṣatriyarṣabhaḥ|

dattaṃ nārāyaṇasyāṃśamārādhya parikarmabhiḥ|| 17

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहने लगे—परीक्षित्! उन दिनों हैहयवंशका अधिपति था अर्जुन। वह एक श्रेष्ठ क्षत्रिय था। उसने अनेकों प्रकारकी सेवा-शुश्रूषा करके भगवान् नारायणके अंशावतार दत्तात्रेयजीको प्रसन्‍न कर लिया और उनसे एक हजार भुजाएँ तथा कोई भी शत्रु युद्धमें पराजित न कर सके—यह वरदान प्राप्त कर लिया। साथ ही इन्द्रियोंका अबाध बल, अतुल सम्पत्ति, तेजस्विता, वीरता, कीर्ति और शारीरिक बल भी उसने उनकी कृपासे प्राप्त कर लिये थे॥ १७-१८॥

यह अर्थ श्लोक 17–18 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. १

    बादरायणिरुवाच।

    (मुद्रित पृष्ठ 77)

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