श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.15.8

नवम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

स ऋषिः प्रार्थितः पत्‍न्या श्‍वश्र्वा चापत्यकाम्यया।

श्रपयित्वोभयैर्मन्त्रैश्‍चरुं स्नातुं गतो मुनिः॥ ८

sa ṛṣiḥ prārthitaḥ patnyā śvaśrvā cāpatyakāmyayā|

śrapayitvobhayairmantraiścaruṃ snātuṃ gato muniḥ|| 8

अर्थ

एक बार महर्षि ऋचीकसे उनकी पत्‍नी और सास दोनोंने ही पुत्रप्राप्तिके लिये प्रार्थना की। महर्षि ऋचीकने उनकी प्रार्थना स्वीकार करके दोनोंके लिये अलग-अलग मन्त्रोंसे चरु पकाया और स्नान करनेके लिये चले गये॥ ८॥✎ 879

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #879 शब्दोंके बीचका स्थान: कियाथा—फिर → किया था—फिर

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