हवनका समय बीत गया, यह जानकर वे महर्षि जमदग्निके शापसे भयभीत हो गयीं और तुरंत वहाँसे आश्रमपर चली आयीं। वहाँ जलका कलश महर्षिके सामने रखकर हाथ जोड़ खड़ी हो गयीं॥ ४॥
कालात्ययं तं विलोक्य मुनेः शापविशंकिता।
आगत्य कलशं तस्थौ पुरोधाय कृतांजलिः॥ ४
हवनका समय बीत गया, यह जानकर वे महर्षि जमदग्निके शापसे भयभीत हो गयीं और तुरंत वहाँसे आश्रमपर चली आयीं। वहाँ जलका कलश महर्षिके सामने रखकर हाथ जोड़ खड़ी हो गयीं॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.16.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 80) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/16/4/