श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.16.5

नवम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

व्यभिचारं मुनिर्ज्ञात्वा पत्‍न्याः प्रकुपितोऽब्रवीत्।

घ्नतैनां पुत्रकाः पापामित्युक्तास्ते न चक्रिरे॥ ५

vyabhicāraṃ munirjñātvā patnyāḥ prakupito'bravīt|

ghnataināṃ putrakāḥ pāpāmityuktāste na cakrire|| 5

अर्थ

जमदग्‍नि मुनिने अपनी पत्‍नीका मानसिक व्यभिचार जान लिया और क्रोध करके कहा—‘मेरे पुत्रो! इस पापिनीको मार डालो।’ परन्तु उनके किसी भी पुत्रने उनकी वह आज्ञा स्वीकार नहीं की॥ ५॥

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