श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.3

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

पितरि भ्रंशिते स्थानादिन्द्राण्या धर्षणाद् द्विजैः।

प्रापितेऽजगरत्वं वै ययातिरभवन्‍नृपः॥ ३

pitari bhraṃśite sthānādindrāṇyā dharṣaṇād dvijaiḥ|

prāpite'jagaratvaṃ vai yayātirabhavannṛpaḥ|| 3

अर्थ

जब इन्द्रपत्‍नी शचीसे सहवास करनेकी चेष्टा करनेके कारण नहुषको ब्राह्मणोंने इन्द्रपदसे गिरा दिया और अजगर बना दिया, तब राजाके पदपर ययाति बैठे॥ ३॥

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