श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.2

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

राज्यं नैच्छद् यतिः पित्रा दत्तं तत्परिणामवित्।

यत्र प्रविष्टः पुरुष आत्मानं नावबुध्यते॥ २

rājyaṃ naicchad yatiḥ pitrā dattaṃ tatpariṇāmavit|

yatra praviṣṭaḥ puruṣa ātmānaṃ nāvabudhyate|| 2

अर्थ

नहुष अपने बड़े पुत्र यतिको राज्य देना चाहते थे। परन्तु उसने स्वीकार नहीं किया; क्योंकि वह राज्य पानेका परिणाम जानता था। राज्य एक ऐसी वस्तु है कि जो उसके दाव-पेंच और प्रबन्ध आदिमें भीतर प्रवेश कर जाता है, वह अपने आत्मस्वरूपको नहीं समझ सकता॥ २॥

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