॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.18.1
अथाष्टादशोऽध्यायः
ययाति-चरित्र
श्रीशुक उवाच
यतिर्ययातिः संयातिरायतिर्वियतिः कृतिः।
षडिमे नहुषस्यासन्निन्द्रियाणीव देहिनः॥ १
yatiryayātiḥ saṃyātirāyatirviyatiḥ kṛtiḥ|
ṣaḍime nahuṣasyāsannindriyāṇīva dehinaḥ|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जैसे शरीरधारियोंके छः इन्द्रियाँ होती हैं, वैसे ही नहुषके छः पुत्र थे। उनके नाम थे—यति, ययाति, संयाति, आयति, वियति और कृति॥ १॥