पूरुने कहा—‘पिताजी! पिताकी कृपासे मनुष्यको परमपदकी प्राप्ति हो सकती है। वास्तवमें पुत्रका शरीर पिताका ही दिया हुआ है। ऐसी अवस्थामें ऐसा कौन है, जो इस संसारमें पिताके उपकारोंका बदला चुका सके?॥ ४३॥
को नु लोके मनुष्येन्द्र पितुरात्मकृतः पुमान्।
प्रतिकर्तुं क्षमो यस्य प्रसादाद् विन्दते परम्॥ ४३
पूरुने कहा—‘पिताजी! पिताकी कृपासे मनुष्यको परमपदकी प्राप्ति हो सकती है। वास्तवमें पुत्रका शरीर पिताका ही दिया हुआ है। ऐसी अवस्थामें ऐसा कौन है, जो इस संसारमें पिताके उपकारोंका बदला चुका सके?॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.18.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 90) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/18/43/