परीक्षित्! इस प्रकार कहकर पूरुने बड़े आनन्दसे अपने पिताका बुढ़ापा स्वीकार कर लिया। राजा ययाति भी उसकी जवानी लेकर पूर्ववत् विषयोंका सेवन करने लगे॥ ४५॥
इति प्रमुदितः पूरुः प्रत्यगृह्णाज्जरां पितुः।
सोऽपि तद्वयसा कामान् यथावज्जुजुषे नृप॥ ४५
परीक्षित्! इस प्रकार कहकर पूरुने बड़े आनन्दसे अपने पिताका बुढ़ापा स्वीकार कर लिया। राजा ययाति भी उसकी जवानी लेकर पूर्ववत् विषयोंका सेवन करने लगे॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.18.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 91) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/18/45/