श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.46

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

सप्तद्वीपपतिः सम्यक् पितृवत् पालयन् प्रजाः।

यथोपजोषं विषयांजुजुषेऽव्याहतेन्द्रियः॥ ४६

saptadvīpapatiḥ samyak pitṛvat pālayan prajāḥ|

yathopajoṣaṃ viṣayāṃjujuṣe'vyāhatendriyaḥ|| 46

अर्थ

वे सातों द्वीपोंके एकच्छत्र सम्राट् थे। पिताके समान भलीभाँति प्रजाका पालन करते थे। उनकी इन्द्रियोंमें पूरी शक्ति थी और वे यथावसर यथाप्राप्त विषयोंका यथेच्छ उपभोग करते थे॥ ४६॥

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