देवयानी उनकी प्रियतमा पत्नी थी। वह अपने प्रियतम ययातिको अपने मन, वाणी, शरीर और वस्तुओंके द्वारा दिन-दिन और भी प्रसन्न करने लगी; और एकान्तमें सुख देने लगी॥ ४७॥
देवयान्यप्यनुदिनं मनोवाग्देहवस्तुभिः।
प्रेयसः परमां प्रीतिमुवाह प्रेयसी रहः॥ ४७
देवयानी उनकी प्रियतमा पत्नी थी। वह अपने प्रियतम ययातिको अपने मन, वाणी, शरीर और वस्तुओंके द्वारा दिन-दिन और भी प्रसन्न करने लगी; और एकान्तमें सुख देने लगी॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.18.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 91) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/18/47/