श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.18.51

नवम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

एवं वर्षसहस्राणि मनःषष्ठैर्मनःसुखम्।

विदधानोऽपि नातृप्यत् सार्वभौमः कदिन्द्रियैः॥ ५१

evaṃ varṣasahasrāṇi manaḥṣaṣṭhairmanaḥsukham|

vidadhāno'pi nātṛpyat sārvabhaumaḥ kadindriyaiḥ|| 51

अर्थ

इस प्रकार एक हजार वर्षतक उन्होंने अपनी उच्छृंखल इन्द्रियोंके साथ मनको जोड़कर उसके प्रिय विषयोंको भोगा। परन्तु इतनेपर भी चक्रवर्ती सम्राट् ययातिकी भोगोंसे तृप्ति न हो सकी॥ ५१॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां
नवमस्कन्धेऽष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥

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