श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.19.1

नवम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

अथैकोनविंशोऽध्यायः

ययातिका गृहत्याग

श्रीशुक उवाच

स इत्थमाचरन् कामान् स्त्रैणोऽपह्नवमात्मनः।

बुद‍्ध्वा प्रियायै निर्विण्णो गाथामेतामगायत॥ १

sa itthamācaran kāmān straiṇo'pahnavamātmanaḥ|

buddhvā priyāyai nirviṇṇo gāthāmetāmagāyata|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! राजा ययाति इस प्रकार स्त्रीके वशमें होकर विषयोंका उपभोग करते रहे। एक दिन जब अपने अधःपतनपर दृष्टि गयी तब उन्हें बड़ा वैराग्य हुआ और उन्होंने अपनी प्रिय पत्‍नी देवयानीसे इस गाथाका गान किया॥ १॥✎ 1644

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1644 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ग्राम-वासी → ग्रामवासी

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