श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.2.12

नवम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

विमुक्तसंगः शान्तात्मा संयताक्षोऽपरिग्रहः।

यदृच्छयोपपन्‍नेन कल्पयन् वृत्तिमात्मनः॥ १२

vimuktasaṃgaḥ śāntātmā saṃyatākṣo'parigrahaḥ|

yadṛcchayopapannena kalpayan vṛttimātmanaḥ|| 12

अर्थ

उसकी सारी आसक्तियाँ मिट गयीं। वृत्तियाँ शान्त हो गयीं। इन्द्रियाँ वशमें हो गयीं। वह कभी किसी प्रकारका संग्रह-परिग्रह नहीं रखता था। जो कुछ दैववश प्राप्त हो जाता, उसीसे अपना जीवन-निर्वाह कर लेता॥ १२॥

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