श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.2.17

नवम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

धृष्टाद् धार्ष्टमभूत् क्षत्रं ब्रह्मभूयं गतं क्षितौ।

नृगस्य वंशः सुमतिर्भूतज्योतिस्ततो वसुः॥ १७

dhṛṣṭād dhārṣṭamabhūt kṣatraṃ brahmabhūyaṃ gataṃ kṣitau|

nṛgasya vaṃśaḥ sumatirbhūtajyotistato vasuḥ|| 17

अर्थ

धृष्टके धार्ष्ट नामक क्षत्रिय हुए। अन्तमें वे इस शरीरसे ही ब्राह्मण बन गये। नृगका पुत्र हुआ सुमति, उसका पुत्र भूतज्योति और भूतज्योतिका पुत्र वसु था॥ १७॥

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