मरुत्तका यज्ञ जैसा हुआ वैसा और किसीका नहीं हुआ। उस यज्ञके समस्त छोटे-बड़े पात्र अत्यन्त सुन्दर एवं सोनेके बने हुए थे॥ २७॥
मरुत्तस्य यथा यज्ञो न तथान्यस्य कश्चन।
सर्वं हिरण्मयं त्वासीद् यत् किञ्चिच्चास्यशोभनम्॥ २७
मरुत्तका यज्ञ जैसा हुआ वैसा और किसीका नहीं हुआ। उस यज्ञके समस्त छोटे-बड़े पात्र अत्यन्त सुन्दर एवं सोनेके बने हुए थे॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.2.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 13) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/2/27/
टिप्पणियाँ
१
च्चात्र।
(मुद्रित पृष्ठ 13)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1124 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): किंञ्चिच्चास्य → किञ्चिच्चास्य