॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.2.9
तं शशाप कुलाचार्यः कृतागसमकामतः।
न क्षत्रबन्धुः शूद्रस्त्वं कर्मणा भवितामुना॥ ९
taṃ śaśāpa kulācāryaḥ kṛtāgasamakāmataḥ|
na kṣatrabandhuḥ śūdrastvaṃ karmaṇā bhavitāmunā|| 9
अर्थ
यद्यपि पृषध्रने जान-बूझकर अपराध नहीं किया था, फिर भी कुलपुरोहित वसिष्ठजीने उसे शाप दिया कि ‘तुम इस कर्मसे क्षत्रिय नहीं रहोगे; जाओ, शूद्र हो जाओ’॥ ९॥ पृषध्रने अपने गुरुदेवका यह शाप अंजलि बाँधकर स्वीकार किया और इसके बाद सदाके लिये मुनियोंको प्रिय लगनेवाले नैष्ठिक ब्रह्मचर्य-व्रतको धारण किया॥ १०॥