रन्तिदेवने उनके चरणोंमें नमस्कार किया। उन्हें कुछ लेना तो था नहीं। भगवान्की कृपासे वे आसक्ति और स्पृहासे भी रहित हो गये तथा परम प्रेममय भक्तिभावसे अपने मनको भगवान् वासुदेवमें तन्मय कर दिया। कुछ भी माँगा नहीं॥ १६॥✎ 881
स वै तेभ्यो नमस्कृत्य निःसंगो विगतस्पृहः।
वासुदेवे भगवति भक्त्या चक्रे मनः परम्॥ १६
रन्तिदेवने उनके चरणोंमें नमस्कार किया। उन्हें कुछ लेना तो था नहीं। भगवान्की कृपासे वे आसक्ति और स्पृहासे भी रहित हो गये तथा परम प्रेममय भक्तिभावसे अपने मनको भगवान् वासुदेवमें तन्मय कर दिया। कुछ भी माँगा नहीं॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.21.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 101) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/21/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)