परीक्षित्! उन्हें भगवान्के सिवा और किसी भी वस्तुकी इच्छा तो थी नहीं, उन्होंने अपने मनको पूर्णरूपसे भगवान्में लगा दिया। इसलिये त्रिगुणमयी माया जागनेपर स्वप्न-दृश्यके समान नष्ट हो गयी॥ १७॥✎ 881
ईश्वरालम्बनं चित्तं कुर्वतोऽनन्यराधसः।
माया गुणमयी राजन् स्वप्नवत् प्रत्यलीयत॥ १७
परीक्षित्! उन्हें भगवान्के सिवा और किसी भी वस्तुकी इच्छा तो थी नहीं, उन्होंने अपने मनको पूर्णरूपसे भगवान्में लगा दिया। इसलिये त्रिगुणमयी माया जागनेपर स्वप्न-दृश्यके समान नष्ट हो गयी॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.21.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 102) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/21/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)