श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.23.38

नवम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

अहं वन्ध्यासपत्‍नी च स्नुषा मे युज्यते कथम्।

जनयिष्यसि यं राज्ञि तस्येयमुपयुज्यते॥ ३८

ahaṃ vandhyāsapatnī ca snuṣā me yujyate katham|

janayiṣyasi yaṃ rājñi tasyeyamupayujyate|| 38

अर्थ

‘मैं तो जन्मसे ही बाँझ हूँ और मेरी कोई सौत भी नहीं है। फिर यह मेरी पुत्रवधू कैसे हो सकती है?’ ज्यामघने कहा—‘रानी! तुमको जो पुत्र होगा, उसकी यह पत्‍नी बनेगी’॥ ३८॥

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