श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.24.63

नवम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

भोजवृष्ण्यन्धकमधुशूरसेनदशार्हकैः ।

श्‍लाघनीयेहितः शश्‍वत् कुरुसृंजयपाण्डुभिः॥ ६३

bhojavṛṣṇyandhakamadhuśūrasenadaśārhakaiḥ |

ślāghanīyehitaḥ śaśvat kurusṛṃjayapāṇḍubhiḥ|| 63

अर्थ

परीक्षित्! भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु, शूरसेन, दशार्ह, कुरु, सृंजय और पाण्डुवंशी वीर निरन्तर भगवान्‌की लीलाओंकी आदरपूर्वक सराहना करते रहते थे॥ ६३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें