श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.3.21

नवम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

कथं मतिस्तेऽवगतान्यथा सतां

कुलप्रसूते कुलदूषणं त्विदम्।

बिभर्षि जारं यदपत्रपा कुलं

पितुश्‍च भर्तुश्‍च नयस्यधस्तमः॥ २१

kathaṃ matiste'vagatānyathā satāṃ

kulaprasūte kuladūṣaṇaṃ tvidam|

bibharṣi jāraṃ yadapatrapā kulaṃ

pituśca bhartuśca nayasyadhastamaḥ|| 21

अर्थ

तेरा जन्म तो बड़े ऊँचे कुलमें हुआ था। यह उलटी बुद्धि तुझे कैसे प्राप्त हुई? तेरा यह व्यवहार तो कुलमें कलंक लगानेवाला है। अरे राम-राम! तू निर्लज्ज होकर जार पुरुषकी सेवा कर रही है और इस प्रकार अपने पिता और पति दोनोंके वंशको घोर नरकमें ले जा रही है’॥ २१॥

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