श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.3.20

नवम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

चिकीर्षितं ते किमिदं पतिस्त्वया

प्रलम्भितो लोकनमस्कृतो मुनिः।

यत् त्वं जराग्रस्तमसत्यसम्मतं

विहाय जारं भजसेऽमुमध्वगम्॥ २०

cikīrṣitaṃ te kimidaṃ patistvayā

pralambhito lokanamaskṛto muniḥ|

yat tvaṃ jarāgrastamasatyasammataṃ

vihāya jāraṃ bhajase'mumadhvagam|| 20

अर्थ

‘दुष्टे! यह तूने क्या किया? क्या तूने सबके वन्दनीय च्यवन मुनिको धोखा दे दिया? अवश्य ही तूने उनको बूढ़ा और अपने कामका न समझकर छोड़ दिया और अब तू इस राह चलते जार पुरुषकी सेवा कर रही है॥ २०॥

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