श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.3.34

नवम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

कन्यारत्‍नमिदं राजन् नररत्‍नाय देहि भोः।

भुवो भारावताराय भगवान् भूतभावनः॥ ३४

kanyāratnamidaṃ rājan nararatnāya dehi bhoḥ|

bhuvo bhārāvatārāya bhagavān bhūtabhāvanaḥ|| 34

अर्थ

राजन्! उन्हीं नररत्‍नको यह कन्यारत्‍न तुम समर्पित कर दो। जिनके नाम, लीला आदिका श्रवण-कीर्तन बड़ा ही पवित्र है—वे ही प्राणियोंके जीवनसर्वस्व भगवान् पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अपने अंशसे अवतीर्ण हुए हैं।’ राजा ककुद्मीने ब्रह्माजीका यह आदेश प्राप्त करके उनके चरणोंकी वन्दना की और अपने नगरमें चले आये। उनके वंशजोंने यक्षोंके भयसे वह नगरी छोड़ दी थी और जहाँ-तहाँ यों ही निवास कर रहे थे॥ ३४-३५॥

यह अर्थ श्लोक 34–35 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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