‘अरे, तुमलोगोंने कहीं महर्षि च्यवनजीके प्रति कोई अनुचित व्यवहार तो नहीं कर दिया? मुझे तो यह स्पष्ट जान पड़ता है कि हमलोगोंमेंसे किसी-न-किसीने उनके आश्रममें कोई अनर्थ किया है’॥ ६॥✎ 1631
अप्यभद्रं न युष्माभिर्भार्गवस्य विचेष्टितम्।
व्यक्तं केनापि नस्तस्य कृतमाश्रमदूषणम्॥ ६
‘अरे, तुमलोगोंने कहीं महर्षि च्यवनजीके प्रति कोई अनुचित व्यवहार तो नहीं कर दिया? मुझे तो यह स्पष्ट जान पड़ता है कि हमलोगोंमेंसे किसी-न-किसीने उनके आश्रममें कोई अनर्थ किया है’॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.3.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 15) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/3/6/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)