श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.34

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

प्राहिणोत् साधु विप्रेभ्यो गृहेषु न्यर्बुदानि षट्।

भोजयित्वा द्विजानग्रे स्वाद्वन्‍नं गुणवत्तमम्५॥ ३४

prāhiṇot sādhu viprebhyo gṛheṣu nyarbudāni ṣaṭ|

bhojayitvā dvijānagre svādvannaṃ guṇavattamam|| 34

अर्थ

उन्होंने महाभिषेककी विधिसे सब प्रकारकी सामग्री और सम्पत्तिद्वारा भगवान्‌का अभिषेक किया और हृदयसे तन्मय होकर वस्त्र, आभूषण, चन्दन, माला एवं अर्घ्य आदिके द्वारा उनकी पूजा की। यद्यपि महाभाग्यवान् ब्राह्मणोंको इस पूजाकी कोई आवश्यकता नहीं थी, स्वयं ही उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो चुकी थीं—वे सिद्ध थे—तथापि राजा अम्बरीषने भक्ति-भावसे उनका पूजन किया। तत्पश्‍चात् पहले ब्राह्मणोंको स्वादिष्ट और अत्यन्त गुणकारी भोजन कराकर उन लोगोंके घर साठ करोड़ गौएँ सुसज्जित करके भेज दीं। उन गौओंके सींग सुवर्णसे और खुर चाँदीसे मढ़े हुए थे। सुन्दर-सुन्दर वस्त्र उन्हें ओढ़ा दिये गये थे। वे गौएँ बड़ी सुशील, छोटी अवस्थाकी, देखनेमें सुन्दर, बछड़ेवाली और खूब दूध देनेवाली थीं। उनके साथ दुहनेकी उपयुक्त सामग्री भी उन्होंने भेजवा दी थी॥ ३१—३४॥✎ 1633

यह अर्थ श्लोक 31–34 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. ५

    गुणवन्मधु।

    (मुद्रित पृष्ठ 22)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1633 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: महा-भाग्यवान् → महाभाग्यवान्

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