दुर्वासाजीने अम्बरीषकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और इसके बाद आवश्यक कर्मोंसे निवृत्त होनेके लिये वे नदीतटपर चले गये। वे ब्रह्मका ध्यान करते हुए यमुनाके पवित्र जलमें स्नान करने लगे॥ ३७॥
प्रतिनन्द्य स तद्याच्ञां कर्तुमावश्यकं गतः।
निममज्ज बृहद् ध्यायन् कालिन्दीसलिले शुभे॥ ३७
दुर्वासाजीने अम्बरीषकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और इसके बाद आवश्यक कर्मोंसे निवृत्त होनेके लिये वे नदीतटपर चले गये। वे ब्रह्मका ध्यान करते हुए यमुनाके पवित्र जलमें स्नान करने लगे॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.4.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 23) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/4/37/