श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.37

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

प्रतिनन्द्य स त१द्याच्ञां कर्तुमावश्यकं गतः।

नि२ममज्ज बृहद् ध्यायन् कालिन्दीसलिले शुभे३॥ ३७

pratinandya sa tadyācñāṃ kartumāvaśyakaṃ gataḥ|

nimamajja bṛhad dhyāyan kālindīsalile śubhe|| 37

अर्थ

दुर्वासाजीने अम्बरीषकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और इसके बाद आवश्यक कर्मोंसे निवृत्त होनेके लिये वे नदीतटपर चले गये। वे ब्रह्मका ध्यान करते हुए यमुनाके पवित्र जलमें स्नान करने लगे॥ ३७॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    तद्वाक्यं।

    (मुद्रित पृष्ठ 23)
  2. २

    निर्म०।

    (मुद्रित पृष्ठ 23)
  3. ३

    शुचौ।

    (मुद्रित पृष्ठ 23)

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