यत् कृत्वा साधु मे भूयादधर्मो वा न मां स्पृशेत्॥ ३९✎ 1875
brāhmaṇātikrame doṣo dvādaśyāṃ yadapāraṇe|
yat kṛtvā sādhu me bhūyādadharmo vā na māṃ spṛśet|| 39
अर्थ
उन्होंने कहा—‘ब्राह्मण-देवताओ! ब्राह्मणको बिना भोजन कराये स्वयं खा लेना और द्वादशी रहते पारण न करना—दोनों ही दोष हैं। इसलिये इस समय जैसा करनेसे मेरी भलाई हो और मुझे पाप न लगे, ऐसा काम करना चाहिये॥ ३९॥
ब्राह्मणातिक्रमे दोषो द्वादश्यां यदपारणे।
यत् कृत्वा साधु मे भूयादधर्मो वा न मां स्पृशेत्॥ ३९
उन्होंने कहा—‘ब्राह्मण-देवताओ! ब्राह्मणको बिना भोजन कराये स्वयं खा लेना और द्वादशी रहते पारण न करना—दोनों ही दोष हैं। इसलिये इस समय जैसा करनेसे मेरी भलाई हो और मुझे पाप न लगे, ऐसा काम करना चाहिये॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.4.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 23) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/39/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1875 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): मांस्पृशेत् → मां स्पृशेत्