श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.44

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

अहो अस्य नृशंसस्य श्रियोन्मत्तस्य१ पश्यत।

धर्मव्यतिक्रमं विष्णोरभक्तस्येशमानिनः२॥ ४४

aho asya nṛśaṃsasya śriyonmattasya paśyata|

dharmavyatikramaṃ viṣṇorabhaktasyeśamāninaḥ|| 44

अर्थ

‘अहो! देखो तो सही, यह कितना क्रूर है! यह धनके मदमें मतवाला हो रहा है। भगवान्‌की भक्ति तो इसे छूतक नहीं गयी और यह अपनेको बड़ा समर्थ मानता है। आज इसने धर्मका उल्लंघन करके बड़ा अन्याय किया है॥ ४४॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    श्रिया मत्तस्य।

    (मुद्रित पृष्ठ 24)
  2. २

    स्येष्टमानिनः।

    (मुद्रित पृष्ठ 24)

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