जब दुर्वासाजीने देखा कि मेरी बनायी हुई कृत्या तो जल रही है और चक्र मेरी ओर आ रहा है, तब वे भयभीत हो अपने प्राण बचानेके लिये जी छोड़कर एकाएक भाग निकले॥ ४९॥
तदभिद्रवदुद्वीक्ष्य स्वप्रयासं च निष्फलम्।
दुर्वासा दुद्रुवे भीतो दिक्षु प्राणपरीप्सया॥ ४९
जब दुर्वासाजीने देखा कि मेरी बनायी हुई कृत्या तो जल रही है और चक्र मेरी ओर आ रहा है, तब वे भयभीत हो अपने प्राण बचानेके लिये जी छोड़कर एकाएक भाग निकले॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.4.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 24) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/4/49/