श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.50

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तमन्वधावद् भगवद्रथांगं

दावाग्‍निरुद‍्धूतशिखो यथाहिम्।

तथानुषक्तं१ मुनिरीक्षमाणो

गुहां विविक्षुः प्रससार मेरोः॥ ५०

tamanvadhāvad bhagavadrathāṃgaṃ

dāvāgniruddhūtaśikho yathāhim|

tathānuṣaktaṃ munirīkṣamāṇo

guhāṃ vivikṣuḥ prasasāra meroḥ|| 50

अर्थ

जैसे ऊँची-ऊँची लपटोंवाला दावानल साँपके पीछे दौड़ता है, वैसे ही भगवान्‌का चक्र उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगा। जब दुर्वासाजीने देखा कि चक्र तो मेरे पीछे लग गया है, तब सुमेरु पर्वतकी गुफामें प्रवेश करनेके लिये वे उसी ओर दौड़ पड़े॥ ५०॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    थावसक्तं।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 25)

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