जब उन्हें कहीं भी कोई रक्षक न मिला तब तो वे और भी डर गये। अपने लिये त्राण ढूँढ़ते हुए वे देवशिरोमणि ब्रह्माजीके पास गये और बोले—‘ब्रह्माजी! आप स्वयम्भू हैं। भगवान्के इस तेजोमय चक्रसे मेरी रक्षा कीजिये’॥ ५२॥✎ 1634
अलब्धनाथः स यदा कुतश्चित्
संत्रस्तचित्तोऽरणमेषमाणः ।
देवं विरिंचं समगाद् विधात-
स्त्राह्यात्मयोनेऽजिततेजसो माम्॥ ५२
जब उन्हें कहीं भी कोई रक्षक न मिला तब तो वे और भी डर गये। अपने लिये त्राण ढूँढ़ते हुए वे देवशिरोमणि ब्रह्माजीके पास गये और बोले—‘ब्रह्माजी! आप स्वयम्भू हैं। भगवान्के इस तेजोमय चक्रसे मेरी रक्षा कीजिये’॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.4.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 25) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/4/52/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)