श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.52

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

अलब्धनाथः स यदा कुतश्‍चित्

संत्रस्तचित्तोऽरणमेषमाणः ।

देवं विरिंचं समगाद् विधात-

स्त्राह्यात्मयोनेऽजिततेजसो माम्॥ ५२

alabdhanāthaḥ sa yadā kutaścit

saṃtrastacitto'raṇameṣamāṇaḥ |

devaṃ viriṃcaṃ samagād vidhāta-

strāhyātmayone'jitatejaso mām|| 52

अर्थ

जब उन्हें कहीं भी कोई रक्षक न मिला तब तो वे और भी डर गये। अपने लिये त्राण ढूँढ़ते हुए वे देवशिरोमणि ब्रह्माजीके पास गये और बोले—‘ब्रह्माजी! आप स्वयम्भू हैं। भगवान्‌के इस तेजोमय चक्रसे मेरी रक्षा कीजिये’॥ ५२॥✎ 1634

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1634 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: तेज-वाले → तेजवाले

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