श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.70

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तपो विद्या च विप्राणां निःश्रेयसकरे उभे।

ते एव दुर्विनीतस्य कल्पेते कर्तुरन्यथा॥ ७०

tapo vidyā ca viprāṇāṃ niḥśreyasakare ubhe|

te eva durvinītasya kalpete karturanyathā|| 70

अर्थ

इसमें सन्देह नहीं कि ब्राह्मणोंके लिये तपस्या और विद्या परम कल्याणके साधन हैं। परन्तु यदि ब्राह्मण उद्दण्ड और अन्यायी हो जाय तो वे ही दोनों उलटा फल देने लगते हैं॥ ७०॥

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