श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.5.12

नवम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इति संस्तुवतो राज्ञो विष्णुचक्रं सुदर्शनम्।

अशाम्यत् सर्वतो विप्रं प्रदहद् राजयाच्ञया॥ १२

iti saṃstuvato rājño viṣṇucakraṃ sudarśanam|

aśāmyat sarvato vipraṃ pradahad rājayācñayā|| 12

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—जब राजा अम्बरीषने दुर्वासाजीको सब ओरसे जलानेवाले भगवान्‌के सुदर्शन चक्रकी इस प्रकार स्तुति की, तब उनकी प्रार्थनासे चक्र शान्त हो गया॥ १२॥

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