श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.5.13

नवम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

स मुक्तोऽस्त्राग्‍नितापेन दुर्वासाः स्वस्तिमांस्ततः।

प्रशशंस तमुर्वीशं युञ्जानः परमाशिषः॥ १३

sa mukto'strāgnitāpena durvāsāḥ svastimāṃstataḥ|

praśaśaṃsa tamurvīśaṃ yuñjānaḥ paramāśiṣaḥ|| 13

अर्थ

जब दुर्वासा चक्रकी आगसे मुक्त हो गये और उनका चित्त स्वस्थ हो गया, तब वे राजा अम्बरीषको अनेकानेक उत्तम आशीर्वाद देते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे॥ १३॥

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