श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.6.27

नवम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

राजा तद् यज्ञसदनं प्रविष्टो निशि तर्षितः।

दृष्ट्वा शयानान् विप्रांस्तान् पपौ मन्त्रजलं स्वयम्॥ २७

rājā tad yajñasadanaṃ praviṣṭo niśi tarṣitaḥ|

dṛṣṭvā śayānān viprāṃstān papau mantrajalaṃ svayam|| 27

अर्थ

एक दिन राजा युवनाश्‍वको रात्रिके समय बड़ी प्यास लगी। वह यज्ञशालामें गया, किन्तु वहाँ देखा कि ऋषिलोग तो सो रहे हैं। तब जल मिलनेका और कोई उपाय न देख उसने वह मन्त्रसे अभिमन्त्रित जल ही पी लिया॥ २७॥✎ 1636

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1636 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुत्र-प्राप्तिके → पुत्रप्राप्तिके

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