एक दिन राजा युवनाश्वको रात्रिके समय बड़ी प्यास लगी। वह यज्ञशालामें गया, किन्तु वहाँ देखा कि ऋषिलोग तो सो रहे हैं। तब जल मिलनेका और कोई उपाय न देख उसने वह मन्त्रसे अभिमन्त्रित जल ही पी लिया॥ २७॥✎ 1636
राजा तद् यज्ञसदनं प्रविष्टो निशि तर्षितः।
दृष्ट्वा शयानान् विप्रांस्तान् पपौ मन्त्रजलं स्वयम्॥ २७
एक दिन राजा युवनाश्वको रात्रिके समय बड़ी प्यास लगी। वह यज्ञशालामें गया, किन्तु वहाँ देखा कि ऋषिलोग तो सो रहे हैं। तब जल मिलनेका और कोई उपाय न देख उसने वह मन्त्रसे अभिमन्त्रित जल ही पी लिया॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.6.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 34) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/6/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)