श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.7.11

नवम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

निर्दशे च स आगत्य यजस्वेत्याह सोऽब्रवीत्।

दन्ताः पशोर्यज्जायेरन्‍नथ मेध्यो भवेदिति॥ ११

nirdaśe ca sa āgatya yajasvetyāha so'bravīt|

dantāḥ paśoryajjāyerannatha medhyo bhavediti|| 11

अर्थ

दस दिन बीतनेपर वरुणने आकर फिर कहा—‘अब मेरा यज्ञ करो।’ हरिश्‍चन्द्रने कहा—‘जब आपके यज्ञपशुके मुँहमें दाँत निकल आयेंगे, तब वह यज्ञके योग्य होगा’॥ ११॥✎ 1637 2046

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1637 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विश्‍वा-मित्र → विश्‍वामित्र
  • #2046 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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