॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 9.7.26
खे वायुं धारयंस्तच्च भूतादौ तं महात्मनि।
तस्मिन् ज्ञानकलां ध्यात्वा तयाज्ञानं विनिर्दहन्॥ २६
khe vāyuṃ dhārayaṃstacca bhūtādau taṃ mahātmani|
tasmin jñānakalāṃ dhyātvā tayājñānaṃ vinirdahan|| 26
अर्थ
परीक्षित्! आगे चलकर मैं शुनःशेपका माहात्म्य वर्णन करूँगा। हरिश्चन्द्रको अपनी पत्नीके साथ सत्यमें दृढ़तापूर्वक स्थित देखकर विश्वामित्रजी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उन्हें उस ज्ञानका उपदेश किया जिसका कभी नाश नहीं होता। उसके अनुसार राजा हरिश्चन्द्रने अपने मनको पृथ्वीमें, पृथ्वीको जलमें, जलको तेजमें, तेजको वायुमें और वायुको आकाशमें स्थिर करके, आकाशको अहंकारमें लीन कर दिया। फिर अहंकारको महत्तत्त्वमें लीन करके उसमें ज्ञान-कलाका ध्यान किया और उससे अज्ञानको भस्म कर दिया॥ २४—२६॥