श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.7.27

नवम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

हित्वा तां स्वेन भावेन निर्वाणसुखसंविदा।

अनिर्देश्याप्रतर्क्येण तस्थौ विध्वस्तबन्धनः॥ २७

hitvā tāṃ svena bhāvena nirvāṇasukhasaṃvidā|

anirdeśyāpratarkyeṇa tasthau vidhvastabandhanaḥ|| 27

अर्थ

इसके बाद निर्वाण-सुखकी अनुभूतिसे उस ज्ञान-कलाका भी परित्याग कर दिया और समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर वे अपने उस स्वरूपमें स्थित हो गये, जो न तो किसी प्रकार बतलाया जा सकता है और न उसके सम्बन्धमें किसी प्रकारका अनुमान ही किया जा सकता है॥ २७॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे
हरिश्‍चन्द्रोपाख्यानं नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥

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