इन्द्रने राजकुमारोंकी बुद्धि हर ली थी, इसीसे उन्होंने कपिलमुनि-जैसे महापुरुषका तिरस्कार किया। इस तिरस्कारके फलस्वरूप उनके शरीरमें ही आग जल उठी जिससे क्षणभरमें ही वे सब-के-सब जलकर खाक हो गये॥ १२॥
स्वशरीराग्निना तावन्महेन्द्रहृतचेतसः।
महद्व्यतिक्रमहता भस्मसादभवन् क्षणात्॥ १२
इन्द्रने राजकुमारोंकी बुद्धि हर ली थी, इसीसे उन्होंने कपिलमुनि-जैसे महापुरुषका तिरस्कार किया। इस तिरस्कारके फलस्वरूप उनके शरीरमें ही आग जल उठी जिससे क्षणभरमें ही वे सब-के-सब जलकर खाक हो गये॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.8.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 42) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/8/12/