श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.8.24

नवम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तं त्वामहं ज्ञानघनं स्वभाव-

प्रध्वस्तमायागु२णभेदमोहैः ।

सनन्दनाद्यैर्मुनिभिर्विभाव्यं

कथं हि मूढः परिभावयामि॥ २४

taṃ tvāmahaṃ jñānaghanaṃ svabhāva-

pradhvastamāyāguṇabhedamohaiḥ |

sanandanādyairmunibhirvibhāvyaṃ

kathaṃ hi mūḍhaḥ paribhāvayāmi|| 24

अर्थ

आप एकरस, ज्ञानघन हैं। सनन्दन आदि मुनि, जो आत्मस्वरूपके अनुभवसे मायाके गुणोंके द्वारा होनेवाले भेदभावको और उसके कारण अज्ञानको नष्ट कर चुके हैं, आपका निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं। मायाके गुणोंमें ही भूला हुआ मैं मूढ़ किस प्रकार आपका चिन्तन करूँ?॥ २४॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    मयमोहभेदैः।

    (मुद्रित पृष्ठ 44)

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