श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.8.23

नवम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

ये देहभाजस्त्रिगुणप्रधाना

गुणान् वि१पश्यन्त्युत वा तमश्‍च।

यन्मायया मोहितचेतसस्ते

विदुः स्वसंस्थं न बहिःप्रकाशाः॥ २३

ye dehabhājastriguṇapradhānā

guṇān vipaśyantyuta vā tamaśca|

yanmāyayā mohitacetasaste

viduḥ svasaṃsthaṃ na bahiḥprakāśāḥ|| 23

अर्थ

संसारके शरीरधारी सत्त्वगुण, रजोगुण या तमोगुण-प्रधान हैं। वे जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओंमें केवल गुणमय पदार्थों, विषयोंको और सुषुप्ति-अवस्थामें केवल अज्ञान-ही-अज्ञान देखते हैं। इसका कारण यह है कि वे आपकी मायासे मोहित हो रहे हैं। वे बहिर्मुख होनेके कारण बाहरकी वस्तुओंको तो देखते हैं, पर अपने ही हृदयमें स्थित आपको नहीं देख पाते॥ २३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रपश्य०।

    (मुद्रित पृष्ठ 44)

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