प्रभो! यह संसार आपकी मायाकी करामात है। इसको सत्य समझकर काम, लोभ, ईर्ष्या और मोहसे लोगोंका चित्त शरीर तथा घर आदिमें भटकने लगता है। लोग इसीके चक्करमें फँस जाते हैं॥ २६॥
त्वन्मायारचिते लोके वस्तुबुद्ध्या गृहादिषु।
भ्रमन्ति कामलोभेर्ष्यामोहविभ्रान्तचेतसः॥ २६
प्रभो! यह संसार आपकी मायाकी करामात है। इसको सत्य समझकर काम, लोभ, ईर्ष्या और मोहसे लोगोंका चित्त शरीर तथा घर आदिमें भटकने लगता है। लोग इसीके चक्करमें फँस जाते हैं॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.8.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 44) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/8/26/