॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.1.58
जना अघासुरायन्ते शाठ्यदुष्कर्मकारिणः।
इह सन्तो विषीदन्ति प्रहृष्यन्ति ह्यसाधवः।
धत्ते धैर्यं तु यो धीमान् स धीरः पण्डितोऽथवा॥ ५८
janā aghāsurāyante śāṭhyaduṣkarmakāriṇaḥ|
iha santo viṣīdanti prahṛṣyanti hyasādhavaḥ|
dhatte dhairyaṃ tu yo dhīmān sa dhīraḥ paṇḍito'thavā|| 58
अर्थ
लोग शठता और दुष्कर्ममें लगकर अघासुर बन रहे हैं। संसारमें जहाँ देखो, वहीं सत्पुरुष दुःखसे म्लान हैं और दुष्ट सुखी हो रहे हैं। इस समय जिस बुद्धिमान् पुरुषका धैर्य बना रहे, वही बड़ा ज्ञानी या पण्डित है॥ ५८॥