॥ श्रीहरिः ॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा विस्मयं परमं गता।
भक्तिरूचे वचो भूयः श्रूयतां तच्च शौनक॥ ७८
iti tadvacanaṃ śrutvā vismayaṃ paramaṃ gatā|
bhaktirūce vaco bhūyaḥ śrūyatāṃ tacca śaunaka|| 78
अर्थ
सूतजी कहते हैं—शौनकजी! इस प्रकार देवर्षि नारदके वचन सुनकर भक्तिको बड़ा आश्चर्य हुआ; फिर उसने जो कुछ कहा, उसे सुनिये॥ ७८॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा विस्मयं परमं गता।
भक्तिरूचे वचो भूयः श्रूयतां तच्च शौनक॥ ७८
सूतजी कहते हैं—शौनकजी! इस प्रकार देवर्षि नारदके वचन सुनकर भक्तिको बड़ा आश्चर्य हुआ; फिर उसने जो कुछ कहा, उसे सुनिये॥ ७८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.1.78 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 40) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/1/78/